केजेएस का किसानों पर कहर पर आवज हुई बुलंद* मां जैसी मिट्टी की पुकार पूंजी के प्रहार के विरुद्ध ग्रामवासियों का चेतावनी भरा स्वर
मैहर | जहाँ एक ओर किसान अपनी मातृभूमि को सींचते हैं, वहीं दूसरी ओर औद्योगिक पूंजी के बुलडोज़र उस पवित्र धरती को रौंदने को आतुर हैं।
ग्राम पंचायत लखवार और सोनवारी क्षेत्र में के जे एस सीमेंट कंपनी द्वारा किसानों की पुश्तैनी जमीन पर रेलवे लाइन निर्माण का कार्य किसानों की आत्मा पर एक गहरा प्रहार बनकर उभरा है। यह जमीन केवल खेत नहीं है यह उनके पुरखों की यादों आशीर्वादों और संघर्षों की वह पवित्र धरा है, जिसे अब व्यापारिक लाभ की दौड़ में रौंदा जा रहा है शासन और प्रशासन इन किसानों के हित में ध्यान आकर्षित नहीं कर रहा है । सभी ग्रामीणजन माननीय न्यायालय की शरण में है । न्यायालय प्रक्रिया के सभी अवसरो का विधि अनुसार प्रयोग करना चाहते हैं जिसमें निर्णय उपरांत विपरीत परिस्थितियों में किसी भी कोर्ट तक न्याय के लिये गुहार क्यों ना लगाने की आवश्यकता पडे उसके लिये भी यह सभी तैयार है किसानों और भूस्वामी ज्ञानेंद्र सिंह ने बताया कि यह धरती हमारी मां है हमने यहां अपने बचपन मे पैर पसारे अपने बुढ़ापे की छाया देखी और अपने पुरखों को यहीं मिट्टी में समर्पित किया हमारे स्मरण पटल पर इन भूमियो की अमित छाप है जिसे विस्मृति नहीं किया जा सकता । अब जब इस धरती को धूल, धुएँ और धमकियों से घायल कर दिया गया है, तब हमसे यह पूछा जा रहा है कि इसे विकास के नाम पर छोड़ क्यों नहीं देते?
किसानों का आरोप है कि केजेएस सीमेंट कंपनी अपनी व्यापारिक सफलता की सीढ़ियाँ हमारे खेतों की छाती पर रखकर चढ़ना चाहती है। पहले उद्योग से निकलता धुआँ, फिर जलते जंगलों का ताप, अब रही-सही कसर इस भूमि अधिग्रहण ने पूरी कर दी है। रेलवे लाइन के निर्माण के नाम पर जो ज़मीन छीनी जा रही है, वह किसानों की आजीविका ही नहीं, उनकी आत्मा का अंश है।
सरकार से हमारा विनम्र अनुरोध है ग्राम पंचायत के एक बुजुर्ग किसान ने कहा कि वह पूंजीपतियों के इशारों पर नहीं, जनता की भावनाओं पर निर्णय ले। हमारी मां जैसी ज़मीन को हमसे छीनना, हमें अनाथ कर देने जैसा है। हम ऐसी क्रूरता के खिलाफ हर स्तर पर संघर्ष करेंगे।
भूस्वामी बृजेन्द्र सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर उनकी पुश्तैनी ज़मीन पर जबरन कब्जा किया गया, तो वे लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन की राह पर उतरेंगे। वही भूस्वामी जनार्दन प्रसाद द्विवेदी ने बताया कि धरती हमारी मां है कोई उसे छीन नहीं सकता। यह संकल्प अब गांव की हवा में तैर रहा है। फैक्ट्री दोहरा मापदंड अपना रही है कहीं पर रेलवे लाइन मार की जमीन ले रही है जिससे वह किसान जिसकी जमीन रेलवे लाइन के बीचो-बीच पड़ रही है उसका अंश भाग रेलवे लाइन के इधर और शेष भाग रेलवे लाइन के उधर हो जाएगा तो वह जमीन का बंदोबस्त कैसे करेगा वहीं कुछ जमीन है जो किसान देना नहीं चाहते और फैक्ट्री को उनके जमीनों की आवश्यकता भी नहीं है उनकी भी पूरी जमीन इसी आधार पर ले रही है जबकि उनकी जमीन से अशं भाग मे ही रेलवे लाइन जा रही है । वही भूमि का अधिग्रहण आज कर रहे हैं और रेट सूची आज की नही देकर पुराने समय के निर्धारित रेट से बेशकीमती जमीनो का भुगतान करना चाहते है जो अत्यंत अन्याय पूर्ण है जिसकी लड़ाई यहां का किसान भू स्वामी इन पूंजीपतियों से लड़ेगा अपनी मां जैसी जमीन का सौदा इनकी शर्तों पर नहीं स्वीकार करेगा । अब देखना यह है कि प्रजातांत्रिक देश में सरकार प्रशासन न्यायपूर्ण किसानों भूस्वामियों के हक मे खडा होता है या फिर चमचमाती मर्सिडीज़ में चलने वाले इन फैक्ट्री प्रबंधन के

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