गुरु पूर्णिमा : सनातन ज्ञान परंपरा की ज्योति और गुरु का सार्वभौमिक स्वरूप - ज्योतिषाचार्य पं. राघव शरण जी महाराज
भारतीय संस्कृति में “गुरु” शब्द मात्र कोई सम्बोधन नहीं, वरन् वह दिव्यता है जो अंधकार में भटकते हुए चित्त को प्रकाश, पथ और परमानंद की ओर अग्रसर करता है। ‘गु’ अर्थात अंधकार, ‘रु’ अर्थात निवारण इस प्रकार गुरु वह है जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर आत्मज्ञान प्रदान करता है।
🔱 गुरु पूर्णिमा का शास्त्रसम्मत मूलाधार
गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। यह दिन महर्षि वेदव्यास के जन्म दिवस के रूप में प्रतिष्ठित है, जिन्होंने वेदों का वर्गीकरण, महाभारत का प्रणयन एवं पुराणों की रचना कर सनातन धर्म को सुव्यवस्थित किया। शास्त्रों में यह दिन “व्यास पूर्णिमा” भी कहा गया है। गुरु पूर्णिमा को आदिगुरु शिव, ब्रह्मा, नारद, दत्तात्रेय एवं वशिष्ठ परंपरा का उत्सव भी माना गया है, जो गुरु–तत्त्व की अखंड परंपरा का सूचक है।
वेदों में कहा गया है आचार्याद् पादमादत्ते पादं शिष्यः स्वमेधया।
पादं सब्रह्मचारिभ्यः पादं कालक्रमेण च॥
अर्थात, शिष्य अपने गुरु से केवल एक चौथाई ज्ञान प्राप्त करता है, शेष अपनी बुद्धि, अन्य सहपाठियों और कालक्रम से अर्जित करता है यही परंपरा गुरु पूर्णिमा के महत्व को विस्तारित करती है।
ज्योतिषीय एवं खगोलीय दृष्टिकोण
ज्योतिषशास्त्र में गुरु ग्रह (बृहस्पति) ज्ञान, धर्म, न्याय और सदाचार का प्रतिनिधित्व करता है। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन चंद्रमा धनिष्ठा, उत्तराषाढ़ या श्रवण नक्षत्र में स्थित होकर गुरु की ऊर्जा को पुष्ट करता है। यह योग साधना, मंत्र दीक्षा, दीर्घकालिक अध्ययन प्रारंभ करने एवं गुरु से सान्निध्य प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभकारक है।
बृहस्पति का प्रभाव चित्त, बौद्धिक संतुलन, निर्णय क्षमता और सदगुणों की वृद्धि में सहायक होता है। अतः इस दिन गुरु की आराधना करने से जीवन के समस्त ग्रहदोषों का निवारण एवं मनोवांछित सिद्धियों की प्राप्ति संभव होती है।
आज जब भौतिकता की अंध दौड़ में मानव अपने ही मूल्यों से भटक चुका है, तब गुरु की आवश्यकता और भी प्रबल हो उठी है। गुरु न केवल विद्या का दाता है, वह चरित्र, चेतना, संयम और समर्पण का स्रोत है। गुरु पूर्णिमा इसीलिए केवल पर्व नहीं, यह अंतःकरण की शुद्धि, श्रद्धा की अभिव्यक्ति और चिरंतन ज्ञान परंपरा से पुनः जुड़ने का अवसर है ।
गुरु पूर्णिमा हमें स्मरण कराती है कि जीवन में कोई भी उपलब्धि, कोई भी मार्गदर्शन, गुरु के बिना संभव नहीं।
जिस प्रकार सूर्य उदय होते ही अंधकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार गुरु कृपा से अज्ञान, मोह, संशय और दुःख का अंधकार नष्ट हो जाता है। आइए, इस पावन गुरु पूर्णिमा पर, हम अपने जीवन के सभी गुरुओं को समर्पित होकर नमन करें।
🙏 गुरवे नमः।

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