गृहस्थ जीवन, ग्रहों की गति और वास्तु से आरोग्य – एक दिव्य संगति ✍️ ज्योतिषाचार्य वास्तुविद पं. राघव शरण जी महाराज
गृहं धर्मस्य मूलं स्मृतं। न गृहं गृहं इत्याहुर्गृहिणी यत्र वर्तते।
अर्थात जहां संयम श्रद्धा सौहार्द और सन्तुलन है, वही सच्चा गृह है।
गृहस्थ जीवन वह आधार है जहां से जीवन के चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की यात्रा प्रारंभ होती है। किन्तु यह यात्रा तभी सफल होती है, जब गृह के चारों ओर के सूक्ष्म शक्तियाँ ग्रह, दिशाएं, ऊर्जा केंद्र अनुकूल हों।
ग्रहों का प्रभाव गृहस्थ जीवन पर
1️⃣ सूर्य – आत्मबल और पारिवारिक नेतृत्व
“सूर्योऽस्ति आत्मतेजसः प्रेरकः।”
सूर्य शुभ हो तो घर में सम्मान, नेतृत्व और स्वास्थ्य बना रहता है।
दोषग्रस्त हो तो घमंड, टकराव और पिता से मतभेद उत्पन्न होते हैं।
उपाय: प्रातःकाल सूर्य अर्घ्य, ताम्र पात्र में जल, “ॐ घृणिः सूर्याय नमः” का जप।
2️⃣ चंद्र – मानसिक संतुलन और गृहलक्ष्मी का भाव
चंद्र की कृपा से स्त्री का सम्मान, भावनात्मक जुड़ाव, संतान सुख बना रहता है। दोष हो तो घर में कलह, अनिद्रा, असंतुलन का माहौल होता है।
उपाय: सोमवार का व्रत, चंद्रमा को दूध मिश्रित जल से अर्घ्य।
3️⃣ मंगल – गृह निर्माण, ऊर्जा व यौवन
गृहस्थ जीवन में मंगल ही है जो रक्त संबंधों में सामंजस्य, भूमि सुख और दाम्पत्य साहस देता है।
दोषग्रस्त मंगल वैवाहिक जीवन में टकराव, दुर्घटनाएं, रक्त विकार देता है।
उपाय: मंगळवार को हनुमान चालीसा, रक्तदान, लाल चंदन का तिलक ।
4️⃣ शुक्र – प्रेम, सौंदर्य, विलास और वैवाहिक सुख
शुक्र समृद्ध गृहस्थ जीवन का दर्पण है। यदि यह दुर्बल हो, तो वैवाहिक सुख, यौन संतुलन और सौंदर्य चेतना बाधित होती है।
उपाय: शुक्रवार को सुगंध, सफेद वस्त्र, कमल पुष्प अर्पण, रति-संयम।
5️⃣ शनि – धैर्य, सेवा और पारिवारिक कर्मफल
घर में शनि शुभ हो तो धैर्य, अनुशासन, बुजुर्गों का आशीर्वाद बना रहता है।
दोषग्रस्त हो तो शारीरिक क्लेश, रिश्तों में दूरी, दुर्भाग्य बढ़ता है।
उपाय: शनिवार को तेल दान, पीपल की परिक्रमा, श्वान सेवा।
वास्तु और आरोग्य – रोग नाश का रहस्य
यत्र वायुः सुसंचरति, तत्र रोगो न दृश्यते।
जहां ऊर्जा स्वतंत्र रूप से बहती है, वहां रोग प्रवेश नहीं करता।
दिशा अनुसार स्वास्थ्य प्रभाव:
पूर्व: सूर्य की ऊर्जा – सही शौचालय न होने से पेट रोग।
दक्षिण-पश्चिम: स्थिरता की दिशा – यहाँ शयन कक्ष होने से गठिया, हड्डी रोग नहीं होते।
ईशान कोण: देवस्थान – यदि अपवित्र या बंद हो, तो मानसिक रोग, चिंता।
अग्निकोण (दक्षिण-पूर्व): यदि रसोई के स्थान पर शयनकक्ष हो, तो चिड़चिड़ापन, रक्त विकार।
गृहस्थी में स्वास्थ्य हेतु वास्तु सुझाव
✅ सोते समय सिर दक्षिण, पैर उत्तर रखें।✅ शयनकक्ष में आईना न रखें, विशेषतः पलंग के सामने।✅ घर में तुलसी, गंगाजल, दीपक व वेद मंत्र की ध्वनि नियमित करें।✅ घर के ईशान कोण को कभी भी भारी सामान से न ढकें।
अंत में – ग्रहों और वास्तु का मेल जीवन को ऊर्जावान बनाता है
“न कालो दोषः, न ग्रहः दुःखकरः – स्वयंकृतं कर्म दोषाय भवति।”
पंडित राघव शरण जी महाराज कहते हैं –
गृहस्थ जीवन तब दिव्य होता है जब मन, घर और ग्रह – तीनों संतुलित हों। ज्योतिष मार्गदर्शक है, नियंता नहीं। वास्तु उपचार है, बाधा नहीं। और आप – अपने जीवन के सच्चे शिल्पकार हैं।"

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