मैहर, शारदा धाम। जहाँ एक ओर भक्तजन माँ शारदा के दर्शन को नतमस्तक होकर आते हैं, वहीं उसी पावन धाम के मार्ग पर एक गौमाता पिछले कई दिनों से गंदगी से भरे खुले नाले में बघेल हाउस के आसपास स्थित नाले  स्थित नाले में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही है। यह दृश्य न केवल आंखों को पीड़ा देता है, बल्कि नगर प्रशासन की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को भी उजागर करता है।
नाला, जो कि वर्षों से खुला पड़ा है, नगर पालिका की "ढांक पक्की, काम कच्चा" नीति का जीता-जागता प्रमाण बन चुका है। नालों को ढंकने का कार्य केवल कागजों में सीमित रह गया है। न सफाई न मरम्मत न संरक्षा। परिणामस्वरूप नालों में हर ओर प्लास्टिक सड़ी गली खाद्य सामग्री बोतलें और विषैली गंदगी का अंबार है। यही गंदगी निरीह गौवंश को अपनी ओर आकृष्ट करती है और फिर वही गंदगी उनका काल बन जाती है।
गौमाता की इस त्रासदी के अनेक गवाह हैं लेकिन अफ़सोस, इस पीड़ा के किसी संवेदनशील रक्षक नहीं हैं। न नगर पालिका ने सुध ली, न पशु संरक्षण समिति ने न ही वह प्रशासनिक व्यवस्था जागी जो कथित रूप से गौवंश संरक्षण का दावा करती है।

गौरतलब है कि पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अंतर्गत हर जिले में गौवंश संरक्षण एवं देखरेख समिति गठित की जाती है जो कलेक्टर के अधीन होती है। परंतु मैहर की सड़कों पर विचरते घायल, बीमार और अब नालों में फंसे मवेशी इस समिति की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे हैं।
शारदा माता मार्ग जैसे धर्मस्थल के प्रमुख पथ पर गौमाता की ऐसी दयनीय स्थिति देख कर भक्तजन भी व्यथित हैं। कई स्थानीय लोगों ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी पीड़ा साझा की है, किंतु प्रशासनिक मशीनरी का दिल नहीं पिघलता।
यह केवल गाय नहीं हमारी चेतना है जो फँसी हुई है।
जो प्राणी बोल नहीं सकते उनके लिए आवाज़ उठाना ही सच्चा धर्म है। 
शारदा माता मार्ग के समस्त खुले नालों को तत्काल कवर किया जाए चाहिए। नगर पालिका क्षेत्र में नियमित नाला सफाई अभियान चलाया जाना चाहिए
जिले की गौ-संरक्षण समिति को सक्रिय कर, लावारिस व घायल पशुओं के लिए हेल्पलाइन व त्वरित रेस्क्यू टीम बनाई जाए। नही तो
जब तक नाले खुले रहेंगे, गौवंश मरता रहेगा और प्रशासन आंखें मूंदे रहेगा।अब जागने का समय है  न सिर्फ प्रशासन के लिए, बल्कि समाज की आत्मा के लिए। 

न्यूज़ सोर्स : स्थानीय नागरिक