तपती धूप में आदिवासियों ने कलेक्ट्रेट के सामने अपनी जमीन की मिट्टी कलश रखकर किया अनोखा प्रदर्शन
सहिलरा के आदिवासियों ने कलश यात्रा से जताया अपनी ज़मीनों से बेदखली का विरोध कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन*
मैहर । आज कलेक्टर कार्यालय परिसर एक मौन चेतावनी का साक्षी बना। न तो हाथों में लाठियां थीं, न ही उग्र नारे पर जो था वह था माटी से उठता आत्म-संवेदना का स्वर, जो सत्ता के गलियारों को भी झकझोर देने की क्षमता रखता है।
सहिलरा गांव के आदिवासी समुदाय ने, ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष प्रभात द्विवेदी के नेतृत्व में, अपनी पैतृक भूमि से बेदखली के विरोध में गांव से कलेक्ट्रेट तक पैदल कलश यात्रा की। सिर पर अपनी जन्मभूमि की माटी से भरे कलश उठाए, स्त्रियाँ, पुरुष, बुजुर्ग और बच्चे सभी चल रहे थे… संविधान, संस्कृति और स्मृति की रक्षा के लिए।
माटी का संदेश, मातृभूमि की पीड़ा
इस अनूठे प्रदर्शन में आदिवासियों ने कलेक्ट्रेट के सामने कलशों की माटी को ज़मीन पर बिछाकर मातृभूमि को नमन किया। यह केवल प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह उस मिट्टी से नाभिनाल संबंध की पुनः उद्घोषणा थी जिसमें उनके पुरखे समाए हुए हैं।
वे तख्तियों पर लिखे नारों में नहीं, अपनी आंखों की नमी में हजारों साल की विरासत ढो रहे थे
हमारी माटी हमारा हक़
पुरखों की मिट्टी को मत छीनो
हम भारत के मूल निवासी हैं जंगल, ज़मीन, जल पर हमारा अधिकार है।
संविधान की छांव में खड़े आदिवासी अधिकार या उपेक्षा
आदिवासी प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कहा कि वे भारत के मूल निवासी हैं, जिन्होंने सदियों से वन, जल, ज़मीन के साथ संतुलन बनाकर जीवन जिया है। अब उन्हें उन्हीं की भूमि से उजाड़ना न केवल अमानवीय है, बल्कि संविधान के भाग IX और अनुच्छेद 244 (पांचवीं अनुसूची) का सीधा उल्लंघन है।
ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष प्रभात द्विवेदी ने ज्ञापन लेने आये अपर कलेक्टर शैलेन्द्र सिंह से कहा कि
इन आदिवासियों ने वंशानुगत तिनका-तिनका जोड़कर बंजर भूमि को खेती योग्य बनाया है। इसी से हमारे बच्चे पेट भरते हैं, हम जिंदा हैं। लेकिन आज हमें बताया जा रहा है कि इस भूमि पर कॉलोनी प्रोजेक्ट बनेगा, और हमें उजाड़ा जाएगा। हमारे पास दिग्विजय सिंह सरकार द्वारा दिए गए पट्टे और ऋण पुस्तिकाएं हैं, जो इस ज़मीन पर हमारे वैधानिक अधिकार को सिद्ध करते हैं।
प्रशासन को सौंपा गया ज्ञापन
प्रदर्शनकारियों ने ज़िला कलेक्टर को एक गंभीर और करुणात्मक ज्ञापन सौंपते हुए आग्रह किया कि
हम बेसहारा, बेबस आदिवासी हैं हमारी जमीन छिनी गई तो सिर्फ आशियाना नहीं जाएगा, हमारी पहचान, हमारी संस्कृति, और हमारे पूर्वजों की स्मृतियाँ भी समाप्त हो जाएंगी। यह प्रदर्शन केवल विरोध नहीं, चेतावनी है इस शांत लेकिन प्रभावशाली प्रदर्शन ने यह साबित किया कि आदिवासी समाज अब चुप नहीं बैठेगा। वे संविधान, इतिहास और अपने आत्म-संस्कारों से सशस्त्र होकर न्याय की मांग कर रहे हैं।
माटी का न्याय अदालतों से नहीं, संवेदनशीलता से मिलेगा और यही संदेश सहिलारा के लोगों ने आज समूचे समाज को दिया।
जिस धरती ने जन्म दिया, उसे कोई कागज़ की लकीर से नहीं छीना जा सकता।"
सहिलारा की माटी आज बोल उठी और शायद आने वाला इतिहास इसी माटी से न्याय मांगेगा। प्रमुख रूप से घसीटा कोल बिहारी कोल रामाधार कोल पंकज कुशवाहा शारदा पटेल विश्व मोहन बढ़गइयां विनोद शकुंतला अतर्ववेदआई तजिया कोल बब्बू कोल जगदीश कोल रामलाल कोल गुफली कोल लमा कोल गनिया कोल शोभा कोल सुरेंद्र कोल संजू पाल राजेश पाल बैसाखू राम प्रसाद लाडोरा लवकुश लाल नरेंद्र कुशवाहा जी राज बाबू गोविंदा खिलामन इस आंदोलन में शामिल हुए

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