नर्मदा तीर पर अद्भुत आस्था का साक्षात दृश्य कहीं हाथों पर चलता तपस्वी, कहीं माँ को संभाले चलता पुत्र…
नर्मदा परिक्रमा इन दिनों जीवन का पाठ पढ़ा रही है। माँ नर्मदा के तटों पर इन दिनों हवा में बस जय-जय नर्मदे हर की गूँज है। वृक्ष झूम रहे हैं, पथ शांत है, किन्तु उन्हीं मार्गों पर दो भावस्पर्शी दृश्य आत्मा को झकझोर देने वाले हैं।
जहाँ एक ओर धर्मपुरी महाराज बिना पैरों के सहारे केवल दो हाथों पर यात्रा करते दिखाई देते हैं, वहीं दूसरी ओर एक पुत्र अपनी वृद्ध, असमर्थ माँ को व्हीलचेयर में बिठाकर परिक्रमा कर रहा है, ऐसा दृश्य जो आँखों में नमी और हृदय में श्रद्धा भर देता है। तपस्या जैसे शब्द भी कम पड़ जाएँ धर्मपुरी महाराज की परिक्रमा
धूप, मिट्टी, पथरीले मोड़… पर महाराज न रुकते, न थकते।
हाथ ज़मीन पर धूल, पसीना और विश्वास का संगम हर कदम पर।
उनकी देह पर राख, माथे पर भक्ति की रेखा और होंठों पर माँ का नाम
यह दृश्य देखकर लगता है तप सिर्फ सुना नहीं, जीया भी जा सकता है। अमरकंटक की माई की बगिया से 2 अक्टूबर को शुरू हुई यह कठिन साधना जब डिंडोरी पहुँची तो श्रद्धालुओं की आँखों में आश्चर्य और आस्था दोनों थे।
फूलों की वर्षा हुई, जयघोष उठा
"नर्मदे हर!"लोग दूर-दूर से दौड़कर आए, सिर्फ इतना देखने कि मनुष्य के भीतर अगर विश्वास हो तो असंभव भी संभव हो सकता है।
महाराज रुकते नहीं, सिर झुकाकर बस आगे बढ़ते हैं…मानो कह रहे हो कि भक्ति पैरों से नहीं, संकल्प से चलती है।
मातृभक्ति का अनुपम दीप 65 वर्षीय सुदामा नाथ और उनकी 90 वर्षीया माँ
उसी धरा पर कुछ दूरी पर, एक धीमी पर अत्यंत उज्ज्वल यात्रा चल रही है। सागर जिले के सुदामा नाथ दोनों हाथों में व्हीलचेयर थामे धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हैं।
व्हीलचेयर पर उनकी वृद्ध माँ कमज़ोर शरीर, पर चेहरे पर शांति।
सुदामा हर मोड़ पर माँ की चादर ठीक करते, धूप पड़े तो छाया बनते, थकान हो तो मुस्कुराकर आगे बढ़ते।
बेटा नहीं लगता—प्राणों का सहारा लगता है।
रास्ते में मिलने वाले श्रद्धालु उनके चरण स्पर्श कर आशीष लेते हैं।
कई की आँखें भर आती हैं क्योंकि आज की दुनिया में जहाँ माँ-बाप वृद्धाश्रम में भुला दिए जाते हैं,
वहाँ यह पुत्र अपनी माँ को लेकर पूरी नर्मदा घूम रहा है।
यह दृश्य मानो हमें याद दिलाता है
कि माँ भगवान की पहली मूर्ति है… और सेवा सबसे बड़ा तीर्थ।
ये दो यात्राएँ सिर्फ कहानियाँ नहीं संदेश हैं कि एक संकल्प की शक्ति सिखा रहा है,दूसरा प्रेम की अग्नि में तपे पुत्र धर्म का उदाहरण बन रहा है।नर्मदा परिक्रमा आज समाज को बता रही है कि भक्ति मंदिरों तक सीमित नहीं, वह भूमि पर रेंगते हाथों में भी है,और वृद्ध माँ को उठाते कंधों में भी…कहीं तपस्वी अपनी देह को धूल में मिलाकर संसार का कल्याण माँग रहा है,
कहीं बेटा माँ को देवता मानकर पूरी दुनिया घुमा रहा है।
इन दोनों को देख मन अनायास कह उठता है—
भक्ति हो तो ऐसी, सेवा हो तो ऐसी,
नर्मदा साक्षी है — श्रद्धा अभी भी जीवित है। नर्मदे हर… नर्मदे हर…

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