विचार की लौ से राजनीति को आलोकित कर सकते हैं 

 संगठन, संस्कार और स्थायित्व की त्रयी में संजय जोशी की वापसी की पुकार तेज़

भोपाल । भारतीय राजनीति का परिदृश्य जब तमाम प्रयोगों और व्यक्तिवादी आकांक्षाओं के बीच अपनी मूल चेतना से डगमगाने लगता है, तब आवश्यकता होती है ऐसे नेतृत्व की, जो राजनीति को तपस्या की तरह जीता हो, और विचारधारा को लक्ष्य नहीं, धर्म मानता हो।
संजय जोशी, भारतीय जनता पार्टी के लिए आज यही नाम बनकर पुनः चर्चा में हैं  संघनिष्ठ, संयमी, और समर्पित नेतृत्व का आदर्श।

तपस्वी की वापसी या संगठन की पुकार?

भाजपा के संगठनात्मक इतिहास में संजय जोशी का स्थान एक मौन स्तम्भ जैसा ही रहा है  न शोहरत की लालसा, न पद की पिपासा। उन्होंने भाजपा के विस्तार को केवल नारा नहीं, नियोजन और नैतिक अनुशासन से सिद्ध किया। ऐसे समय में जब राजनीति 'इवेंट' बन गई हो, जोशी जैसे नेता आंतरिक चेतना के वाहक हैं  जो राजनीति को विचार, संस्कार और कार्यकर्ता की शक्ति से जोड़ते हैं।

राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए क्यों उठ रहा है संजय जोशी का नाम?

भाजपा का संगठनात्मक ढांचा आज उस चौराहे पर खड़ा है जहां उसे सत्ता की स्थायित्व और वैचारिक प्रामाणिकता दोनों चाहिए। ऐसे में संजय जोशी वह चेहरा हो सकते हैं, जो संघ-भाजपा समन्वय का सेतु बनें, निष्ठा और नैतिकता की मिसाल बनें,और कार्यकर्ताओं के आत्मबल को फिर से जागृत करें।
उनकी संगठन क्षमता का लोहा संघ और भाजपा दोनों स्तरों पर स्वीकारा गया है। उन्होंने न सिर्फ मूल विचारधारा को जिलाए रखा, बल्कि राजनीति को कर्मयोग की तरह साधा।

जोशी: वो नाम जो विचार बन चुका है

राजनीति में कुछ नाम केवल नेता नहीं होते, प्रतिमान बन जाते हैं। संजय जोशी अब केवल व्यक्ति नहीं, एक राजनीतिक मूल्यों की पुनर्रचना का प्रतीक बन चुके हैं।

यदि भाजपा उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में पुनः स्वीकारती है  तो यह न केवल नेतृत्व में नयापन, बल्कि नीति में पुरातन की प्रासंगिकता का पुनः प्रतिष्ठापन होगा।
जो विचारधारा से उपजा हो, वही संगठन को दिशा दे सकता है यह माना जाता है और  भारतीय जनता पार्टी और संघ किस दिशा में विचार कर सकते हैं ! संजय जोशी उसी परंपरा के ध्वजवाहक हैं।

न्यूज़ सोर्स : राज मिडिया