विकास की दीवार या विनाश की दहलीज़ गोलामठ मंदिर मार्ग पर पुलिया निर्माण बना जन संकट
मैहर। लोकनिर्माण विभाग द्वारा गोलामठ मंदिर के पीछे निर्मित सड़क पर जो पुलिया बनाई गई है, वह अब खुद सवालों के घेरे में है। जन सुविधाओं के नाम पर शुरू किया गया यह निर्माणकार्य, अब जनता के लिए परेशानी का कारण बन गया है। निर्धारित डायमेंशन (लंबाई और प्रवाह क्षमता) को नजरअंदाज कर जो पुलिया बनाई गई, वह तकनीकी और व्यावहारिक दोनों कसौटियों पर खरा नहीं उतरती।
वर्षा ऋतु में जब प्रकृति जलधारा के रूप में अपनी शक्ति का परिचय देती है, तब यह अधूरी पुलिया न केवल रास्ता अवरुद्ध करती है बल्कि जल की तीव्र धारा के कारण सड़क तक क्षतिग्रस्त हो जाती है। पुलिया के ऊपर से बहता पानी न केवल यातायात को रोकता है, बल्कि आसपास के क्षेत्र को भी संकट में डाल देता है।
ठेकेदार द्वारा जो निर्माण किया गया है, वह निर्धारित मापदंडों के विपरीत प्रतीत होता है। यह न केवल विभागीय उदासीनता को उजागर करता है, बल्कि कार्य की गुणवत्ता और नीयत पर भी प्रश्नचिह्न खड़े करता है। जब पुलिया की लंबाई और जल निकासी क्षमता ही कम रखी जाए, तो उसका निर्माण अपने आप में एक औचित्यहीन क्रिया बन जाती है। जनता का आक्रोश भी अब सतह पर है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि यह पुलिया बरसात में प्रलय द्वार का रूप ले लेती है। एक ओर शासन सड़क और पुल निर्माण को लेकर करोड़ों रुपये व्यय कर रहा है, वहीं दूसरी ओर धरातल पर ऐसे निर्माण कार्य जनता के विश्वास को तोड़ते हैं।
क्या यह निर्माण विकास का प्रतीक है या सिर्फ आंकड़ों में दर्ज एक और खानापूर्ति?
अब आवश्यकता है कि इस तरह के अधूरे और भ्रामक निर्माण कार्यों की न केवल तकनीकी जांच हो, बल्कि संबंधित ठेकेदार और अधिकारियों के विरुद्ध दृढ़ कार्रवाई की जाए, ताकि जनहित में की जाने वाली योजनाएं वास्तव में जनता के हित में परिणत हों न कि जलप्रलय का निमंत्रण बनें।
समाजसेवी पवन दुबे ने अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि
यह पुलिया नहीं, व्यवस्था की पोल खोलने वाली एक खुली किताब है। जब निर्माण केवल कागज़ों पर होता है और जमीन पर संकट उपजाता है, तब यह विकास नहीं, विनाश की नींव बनता है। विभाग द्वारा तय मापदंडों की अवहेलना और ठेकेदार की मनमानी ने इस संपूर्ण परियोजना को शर्मसार कर दिया है। हम माँग करते हैं कि इस कार्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच कर दोषियों को उत्तरदायी ठहराया जाए, अन्यथा यह पुल नहीं, जन आक्रोश की धारा में बह जाएगा। कलेक्टर मैहर से हमारी न्यायोचित माँगें है कि 1. इस पुलिया निर्माण की स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा समिति से जाँच करवाई जाए।
2. कार्य स्वीकृति देने वाले अभियंता और ठेकेदार से जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
3. आगामी वर्षा ऋतु से पूर्व पुलिया का पुनःनिर्माण या सुधार कार्य किया जाए, ताकि जनता को संकट से राहत मिल सके।
जब पुलिया का उद्देश्य जल को रास्ता देना है, तो क्या उसे इस प्रकार बनाना उचित था कि जल ही उस पर चढ़ बैठे
वास्तविक विकास वहाँ है जहाँ निर्माण जनता की समस्याएँ हल करें, न कि और नई समस्याओं को जन्म दें। गोलामठ की यह अधूरी पुलिया, महज़ एक संरचना नहीं, बल्कि जनहित में असावधानी की प्रतीकात्मक मूर्ति बन गई है।

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