मैहर (सरलानगर)।प्रकृति के आँचल में बसे सरलानगर के जंगल आज विकास के नाम पर उजड़ रहे हैं। जहाँ कभी हरियाली की मृदुल छाया थी वहाँ अब धूल और ज़हर का आलम है। ये क्षेत्र जो मध्यप्रदेश के मैहर तहसील अंतर्गत आता है पिछले कुछ समय से लगातार वन विनाश और औद्योगिक प्रदूषण की दोहरी मार झेल रहा है।
वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है कि क्षेत्र में खुलेआम जहरीले धुएँ का उत्सर्जन हो रहा है। यह धुआँ केवल वातावरण को ही नहीं बल्कि स्थानीय नागरिकों के फेफड़ों को भी काला कर रहा है। लेकिन इसके बावजूद शासन-प्रशासन की आँखें या तो बंद हैं या जान-बूझकर मूँदी गई हैं।
जहां जीवों जंतु जीवन से ज्यादा जरूरी उत्पादन हो जाये जहां एनजीटी के नियमों की खुलेआम अवहेलना हो वहा मानव जीवनमूल्यों की कीमत सिर्फ मौते ही हो सकती है ।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के अनुसार औद्योगिक इकाइयाँ किसी भी प्रकार की उत्सर्जन प्रक्रिया को बिना फिल्टर स्क्रबर अथवा प्रदूषण नियंत्रण यंत्रों के संचालित नहीं कर सकतीं। वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 भी स्पष्ट रूप से औद्योगिक क्रियाओं को वन क्षेत्रों से दूर रखने का निर्देश देते हैं। किन्तु मैहर सीमेन्ट फैक्ट्री के आसपास का दृश्य एक अलग ही कथा कहता है  वहाँ न वृक्ष बचे हैं  न वचन।

नेताओं की विकास परिभाषा  पेड़ काटो ज़हर उड़ाओ

स्थानीय नेताओं के बयान और निरीक्षण भ्रमण में विकास की जो परिभाषा दी जा रही है वह पर्यावरणीय न्याय और सतत विकास के मूल सिद्धांतों के प्रतिकूल है। शायद उनके लिए विकास का अर्थ है
वृक्षों को काटकर कंक्रीट की दीवारें खड़ी करना
हरियाली को समूल नष्ट कर कारखानों का साम्राज्य बसाना
और फिर उस साम्राज्य से उठते ज़हर को उद्योग का गौरव बताना।

पर्यावरण की पीड़ा  जनजीवन पर असर

सरलानगर डेल्हा सोनवारी बम्हनिया सहित आसपास क्षेत्र के नागरिकों में साँस लेने में तकलीफ आंखों में जलन और त्वचा रोगों की शिकायतें बढ़ रही हैं। गाँवों के कुओं का पानी अब पहले जैसा मीठा नहीं, बल्कि कड़वा और गंधयुक्त हो गया है। पशुओं की मौत और पक्षियों का पलायन अब आम बात हो चली है।

सवाल खड़ा होता है क्या वन क्षेत्र में इस प्रकार की औद्योगिक गतिविधि की अनुमति दी गई थी?
यदि नहीं तो कौन जिम्मेदार है  प्रशासन उद्योग या जनप्रतिनिधि?

क्या यह तथाकथित विकास
पर्यावरणीय आपदा को न्योता नहीं दे रहा?
विकास वह नहीं जो जीवन निगल ले विकास वह है जो जीवन को संवार दे।जहाँ वृक्ष हों नदियाँ बहती हों वहीं तो सच्चा प्रगति-पथ है। सरलानगर भदनपुर  के जंगल केवल पेड़ों की भीड़ नहीं थे वे जीवन थे प्राण थे संस्कृति और संतुलन के संवाहक थे। यदि यह क्रम नहीं रुका तो आने वाली पीढ़ियों को केवल धुंआ और खंडहर ही विरासत में मिलेंगे। अब वक्त है आवाज़ उठाने का। प्रकृति के लिए नहीं, खुद अपने अस्तित्व के लिए। हां यह जरूर ध्यान रहे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए अपनी आवाज स्वयं बने ।

न्यूज़ सोर्स : राज मिडिया